बिहार में किसान आंदोलन और विशेष रूप से बकाश्त आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक-आर्थिक सुधारों के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन आंदोलनों ने न केवल किसानों के अधिकारों की रक्षा की, बल्कि जमींदारी प्रथा के खिलाफ एक मजबूत आवाज उठाई। स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे नेताओं ने इन आंदोलनों को संगठित और प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभाई।
प्रमुख किसान आंदोलन:
- चंपारण सत्याग्रह (1917):
- यह बिहार का पहला प्रमुख किसान
आंदोलन था, जिसे महात्मा गांधी ने नेतृत्व
प्रदान किया। चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों को तिनकठिया प्रथा
के तहत अपनी जमीन के 3/20वें हिस्से पर नील उगाने के लिए मजबूर किया जाता था।
नील की खेती से मिट्टी की उर्वरता कम होती थी, और किसानों को उनकी उपज के लिए
उचित मूल्य नहीं मिलता था।
- राजकुमार शुक्ल नामक एक किसान ने
गांधीजी को चंपारण बुलाया। गांधीजी ने सत्याग्रह के माध्यम से किसानों को
संगठित किया और ब्रिटिश सरकार को जांच समिति गठित करने के लिए मजबूर किया।
इसके परिणामस्वरूप चंपारण कृषि अधिनियम 1918 पारित हुआ, जिसने तिनकठिया प्रथा को समाप्त किया और किसानों को
राहत दी।
- बिहार प्रांतीय किसान सभा (1929):
- 1920 के दशक के अंत
में बिहार में उभरे किसान आंदोलन की अगुआई स्वामी सहजानंद सरस्वती के
नेतृत्व में किसान सभा ने की थी। बिहार के गया जिले में किसान सभा एक प्रमुख
राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी- जिसने न केवल जिले के किसानों पर बल्कि यहां
के कांग्रेस आंदोलन पर भी प्रभाव डाला। बिहार में किसान सभा आंदोलन, जिसे 1929 में
बिहार प्रांतीय किसान सभा (BPKS) के गठन द्वारा संस्थागत रूप दिया गया, ने पूरे बिहार में
कई महत्वपूर्ण संघर्षों में किसानों का नेतृत्व किया। 1934 में गया में अपने
सत्र में, किसान सभा ने लगान के मुद्दे को उठाया और सरकार से
लगान कम करने और बकाया राशि को रद्द करने का आग्रह किया।
- 4 मई 1928 को पश्चिमी पटना किसान सभा का गठन
सहजनान्द सरस्वती ने किया। हरिहर
क्षेत्र मेला, जिसे सोनपुर मेला या छत्तर मेला के
नाम से भी जाना जाता जहा 1929 में बिहार प्रांतीय किसान सभा का गठन किया गया। ,
- बिहार प्रांतीय
किसान सभा (BPKS) की परिकल्पना सबसे
पहले 1929 के अंत में बिहार
के सारन जिले के सोनपुर मेले में एक बैठक में की गई थी। भारतीय कृषि में
लगातार समस्याओं की प्रतिक्रिया में, जो 1929
की महामंदी के कारण
और भी बढ़ गई थी, BPKS का नेतृत्व स्वामी
सहजानंद सरस्वती, जदुनंदन शर्मा, कार्यानंद शर्मा और
अन्य नेताओं ने किया था। इसके नेता शुरुआत में गांधीवादी विचारधाराओं से
प्रेरित थे लेकिन बाद में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की ओर आकर्षित हुए
- इसी पृष्ठभूमि में
किसान सभा ने बाद में गया और अन्य जगहों पर बकाश्त आंदोलनों (1936-38) को
नेतृत्व प्रदान किया - जिसने जमींदारों द्वारा काश्तकारों को बेदखल करने का
विरोध किया। भले ही इसने प्रभाव डाला, लेकिन किसान सभा आंदोलन बिहार की कृषि व्यवस्था के
दमनकारी सामंती चरित्र को नहीं तोड़ सका। फिर भी, गया उन जिलों में
से एक था जहाँ किसान सभा आंदोलन किसानों की शिकायतों को कुछ हद तक दूर करने
में सफल रहा।
- अखिल भारतीय किसान सभा (1936):
o
बिहार में शुरू
हुए किसान सभा आंदोलनों ने 1936
में अखिल भारतीय किसान
सभा के गठन के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की। बिहार प्रांतीय किसान सभा ने आने वाले
दशकों में बिहार में जमींदारी उन्मूलन और कई अन्य भूमि सुधारों की नींव रखी।
- 1936 में लखनऊ में कांग्रेस अधिवेशन के
दौरान स्वामी सहजानंद सरस्वती की अध्यक्षता में अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) की स्थापना की गई। यह संगठन बिहार
के किसान आंदोलनों को राष्ट्रीय स्तर पर ले गया और जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार, और किसानों के अधिकारों की वकालत
की।
बकाश्त आंदोलन
बकाश्त आंदोलन( 1936-38) बिहार में किसान आंदोलनों का एक महत्वपूर्ण
हिस्सा था, जो मुख्य रूप से जमींदारों द्वारा बकाश्त
जमीन (जमीन जो जमींदारों द्वारा सीधे खेती के लिए इस्तेमाल की जाती थी, लेकिन अक्सर छोटे किसानों से छीनी जाती
थी) को वापस लेने के खिलाफ था।
- पृष्ठभूमि: बकाश्त जमीन वह थी, जिसे जमींदारों ने छोटे किसानों से
कर्ज, लगान, या अन्य कारणों से छीन लिया था। 1930 के दशक में आर्थिक मंदी और जमींदारी
प्रथा के कारण किसानों की स्थिति और खराब हो गई। बकाश्त आंदोलन ने इन जमीनों
को वापस दिलाने और जमींदारी प्रथा के खिलाफ संघर्ष को तेज किया।
- स्वामी सहजानंद का योगदान: स्वामी सहजानंद ने बकाश्त आंदोलन को
संगठित किया और किसानों को उनके हक के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने बिहटा (पटना) में अपने आश्रम को किसान आंदोलन का केंद्र बनाया। उनके
नेतृत्व में किसानों ने जमींदारों के खिलाफ प्रदर्शन किए और बकाश्त जमीनों को
वापस लेने की मांग की।
- प्रभाव: बकाश्त आंदोलन ने बिहार में
जमींदारी प्रथा के खिलाफ व्यापक जागरूकता पैदा की और भूमि सुधार के लिए नींव
रखी। इसने किसानों में एकता और आत्मविश्वास जगाया।
स्वामी सहजानंद सरस्वती: किसान आंदोलन के जनक
- जीवनी: स्वामी सहजानंद सरस्वती (1889-1950), जिनका मूल नाम नवरंग राय था, उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में
एक भूमिहार परिवार में जन्मे थे। वे एक विद्वान, सन्यासी, और क्रांतिकारी नेता थे। शुरुआत में
वे भूमिहार महासभा से जुड़े थे, लेकिन बाद में उन्होंने जमींदारी प्रथा के खिलाफ
संघर्ष को अपना लक्ष्य बनाया।
- नेतृत्व:
- 1920 में उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से
हुई, जिसने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम
और किसान आंदोलनों की ओर प्रेरित किया।
- उन्होंने बिहार प्रांतीय किसान सभा
(1929) और अखिल भारतीय किसान सभा (1936) की स्थापना की।
- सहजानंद ने
जमींदारों और उद्योगपतियों (जैसे आर.के. डालमिया) के खिलाफ किसानों और
मजदूरों के हितों के लिए संघर्ष किया। 1932 में बिहटा में
डालमिया की चीनी मिल के खिलाफ आंदोलन इसका उदाहरण है, जहाँ उन्होंने
किसानों को गन्ने की आपूर्ति बंद करने के लिए प्रेरित किया। बिहटा के गन्ना किसानो को हक दिलाने के लिए वे
गांधीवादी विचारों को मानने वाले उद्योगपति आरके डालमिया से भीड़ गए थे।
- भारत में ‘किसान आंदोलन का
जनक’ कहलाने वाले दंडी
स्वामी सहजानंद सरस्वती स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। दिसंबर 1920 को पटना में
मजहर उल हक के घर पर महात्मा गांधी से उनकी मुलाकात हुई। फिर उनके विचारों से प्रभावित होकर राष्ट्रीय
स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए।
वामी सहजानंद ने 1941 में प्रकाशित आत्मकथा ‘मेरा जीवन संघर्ष’ में महात्मा
गांधी के जादुई असर के बारे में लिखा है।
- स्वामी सहजानंद
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार जेल गई. कारावास के दौरान गांधीजी का
जमींदारों के प्रति नरम रुख को देखकर वह नाराज हो गए थे. बिहार में 1934 के भूकंप से
तबाह किसानों को मालगुजारी में राहत दिलाने की बात को लेकर वह गांधीजी से भी
भिड़ गए थे. हालात कुछ ऐसे बने की दोनों में अनबन हो गई. इसके बाद उन्होंने
एक झटके में ही कांग्रेस छोड़ दी और अलग होकर अकेले ही किसानों के लिए
जीने-मरने का संकल्प ले लिया. वह अपनी अंतिम सांस तक किसानों और मजदूरों के
हक के लिए लड़ते रहे. 26 जून 1950 को किसान आंदोलन
के जनक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वामी सहजानंद का निधन हो गया
- विचारधारा: सहजानंद शुरू में समझौतावादी थे, लेकिन बाद में उनकी विचारधारा
क्रांतिकारी और मार्क्सवादी हो गई। उन्होंने भूमिहीन किसानों और खेत मजदूरों
को सच्चा किसान मानते हुए भूमि और संसाधनों के राष्ट्रीयकरण की मांग की।
- विरासत: स्वामी सहजानंद को बिहार में किसान
आंदोलन का जनक माना जाता है। उनकी आत्मकथा मेरा जीवन संघर्ष उनके विचारों और संघर्षों को
दर्शाती है। उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर बिहार में कई आयोजन होते हैं, और हाल के वर्षों में बिहटा हवाई
अड्डे का नाम उनके नाम पर रखने की मांग उठी है।
आचार्य नरेंद्र देव
1939 में बिहार के गया जिले में आयोजित अखिल भारतीय किसान सभा के अधिवेशन के अध्यक्ष थे। इस अधिवेशन का उद्देश्य किसानों को मजदूर वर्ग के साथ एकजुट करना और दोनों को सभी प्रकार के उत्पीड़न- जमींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन में एकीकृत करना था।
कार्यानंद शर्मा
किसान नेता
कार्यानन्द शर्मा का जन्म 1901 ई. में मुंगेर जिला के सूर्यगढ़ा थाना स्थित सहूर गांव में
हुआ था। स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में उन्होंने किसानों के लिए अनेक
लड़ाईयाँ लड़ी जिसमें मजदूरों तथा किसानों की जीत हुई। वह आंदोलन के दौरान नौ बार
जेल की यातनाएँ सही। अखिल भारतीय किसान सभा के नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती के चार
प्रमुख सिपहसलार में एक थे। एक गुजरात में
इंदुलाल याज्ञनिक,
मध्य बिहार में
यदुनंदन शर्मा, छपरा में राहुल
सांकृत्यायन तथा बड़हिया मुंगेर क्षेत्र में कार्यानंद शर्मा थे। इनके नेतृत्व में
किसान आंदोलनों में चानन,
कटोरिया, बड़हियाटाल तथा
आठमहला आंदोलन ऐतिहासिक रहा जिसमें बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया था। 1930 ई. के नमक आंदोलन
में इनको गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। 1938 ई. में वह प्रांतीय किसान के सभापति चुने गये। 1942 ई. में वे किसान
सभा के सचिव तथा 1945 ई. में अखिल
भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष चुने गये। इसी बीच उनका झुकाव साम्यवाद की ओर हुआ।
उनकी गणना कुछ ही समय में साम्यवादी नेता के रूप में होने लगी। कार्यानन्द शर्मा
हजारीबाग जेल में सितम्बर 1941 से फरवरी 1942 तक रहे। जेल में
ही अन्याय के विरूद्ध 49 दिनों तक अनशन
किया। 1965 ई. में इनकी मृत्यु हो गई। इनकी स्मृति में कार्यानन्द
स्मारक महाविद्यालय लक्खीसराय में स्थापित है।
यदुनन्दन शर्मा
जदुनंदन शर्मा बिहार के गया जिले के जाने-माने किसान नेताओं
में से एक थे।यदुनन्दन शर्मा का
जन्म 1896 में मझियांवा में हुआ था। 1933
में वे किसान सभा
में शामिल हो गए और नियायतपुर में किसान आश्रम बनाकर त्रस्त किसानों में जान फूंकनी शुरू की। 1936 में उनके नेतृत्व में बेलागंज अंचल के सहबाजपुर और टेकारी
अंचल के सांडा के किसानों का संगठित संघर्ष हुआ जिसमें किसानों की जीत हुई। 1938 में वारसलीगंज के रेवड़ा गाँव का किसान सत्याग्रह उनके
नेतृत्व में भारत के किसान आंदोलन के इतिहास में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 1938 में उन्होंने एक ऐतिहासिक पत्रिका ‘चिन्गारी’ के नाम से निकाली जिसने न केवल तहलका मचा
दिया बल्कि प्रशासन को हिलाकर रख दिया था। शर्मा जी ने सरकारी सेवा को त्यागकर
किसानों की करूण वेदना को समझा तथा उनकी मदद की।
03 मार्च 1975
को उनका निधन हुआ।
किसान नेता राहुल
सांकृत्यायन
राहुल सांकृत्यायन
का जन्म 9 अप्रैल,
1893 को उत्तर प्रदेश
के आज़मगढ़ में हुआ था। अपनी प्रसिद्ध महान कृति वोल्गा से गंगा की तरह ही, उनका जीवन असंख्य अनुभवों और ज्ञान का संग्रह था। महापंडित माने जाने वाले इस
महान विद्वान ने स्वतंत्रता संग्राम में भी योगदान दिया। कश्मीर से कन्याकुमारी की
यात्रा करते हुए, उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया। श्रीलंका में उन्होंने राहुल सांकृत्यायन नाम
अपनाया और अंत में, समाजवाद को अपनाया। वे यूरोप और एशिया की दो दर्जन से अधिक भाषाओं में
पारंगत थे और उन्होंने 100 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित कीं। वे एक
प्रसिद्ध देशभक्त भी थे प्रथम विश्व युद्ध
के दौरान, उन्होंने असहयोग आंदोलन में किसानों को
शामिल करने की कोशिश की। 1938 में भारत लौटने के बाद, उन्होंने बिहार के सारन जिले के छपरा शहर में किसानों को सत्याग्रह आंदोलन में
शामिल करके अपनी राजनीतिक गतिविधियों की शुरुआत की।1939
में बिहार के
अमवारी किसान आंदोलन में राहुल सांकृत्यायन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस आंदोलन के
दौरान उनकी गिरफ्तारी भी हुई, जो उनके किसान आंदोलन के प्रति समर्पण को
दर्शाता है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद जेल से रिहा
होने पर, स्वामी सहजानंद सरस्वती ने उन्हें किसान
आंदोलन की साप्ताहिक पत्रिका हुंकार का संपादक नियुक्त किया। इस पत्रिका के माध्यम
से उन्होंने किसानों की समस्याओं और जमींदारी शोषण के खिलाफ जागरूकता फैलाई। भारत
के बौद्धिक ताने-बाने में उनके गहन योगदान के लिए,
उन्हें साहित्य
अकादमी पुरस्कार (1958) और पद्म भूषण पुरस्कार (1963) से सम्मानित किया गया।
प्रभाव और महत्व
- बिहार के किसान आंदोलनों ने न केवल
स्थानीय स्तर पर जमींदारों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता
संग्राम को मजबूत किया।
- बकाश्त आंदोलन ने भूमि सुधार की
नींव रखी, जो स्वतंत्रता के बाद बिहार में
जमींदारी उन्मूलन अधिनियम (1950) के रूप में सामने आई।
- स्वामी सहजानंद जैसे नेताओं ने
किसानों में सामाजिक और आर्थिक जागरूकता पैदा की, जो आज भी बिहार के सामाजिक-राजनीतिक
परिदृश्य को प्रभावित करती है।
निष्कर्ष
बिहार के किसान
आंदोलन, विशेष रूप से बकाश्त आंदोलन, और स्वामी सहजानंद सरस्वती का नेतृत्व
भारतीय इतिहास में सामाजिक न्याय और किसान अधिकारों के लिए एक मील का पत्थर है। इन
आंदोलनों ने न केवल किसानों को उनके हक दिलाए, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम को भी गति दी।
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