Skip to main content

शिमला समझौता : क्या है और क्या प्रभाव होगा इसके निलंबन का

 पहलगाम आतंकी हमले (22 अप्रैल 2025) के बाद, जिसमें जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के बैसरण वैली में निर्दोष भारतीयों (ज्यादातर पर्यटक) की हत्या हुई, भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम उठाए। यह हमला द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF), लश्कर-ए-ताइबा की एक शाखा, द्वारा किया गया, जिसे भारत ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद से जोड़ा।

पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कुछ कड़े कदम उठाये। इनमे सिंधु जल समझौता का निलंबन , वीजा रद्द करना और बाघा - अटारी बॉर्डर को बंद करना प्रमुख है। इसके प्रत्युत्तर में पाकिस्तान ने भी कई कड़े कदम उठाये जिसमे शिमला समझौता का निलंबन प्रमुख है। अन्य है

पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाइयाँ

  • भारतीय नागरिकों के लिए सभी वीजा निलंबित कर दिए गए, और सिख तीर्थयात्रियों को छोड़कर सभी भारतीयों को 48 घंटे में पाकिस्तान छोड़ने का आदेश दिया गया।
  • भारतीय विमानों के लिए हवाई क्षेत्र बंद कर दिया गया।
  • वाघा सीमा चौकी बंद कर दी गई और सभी व्यापार गतिविधियाँ निलंबित कर दी गईं।
  • शिमला समझौता (1972) सहित सभी द्विपक्षीय समझौतों को निलंबित करने की घोषणा की गई।
  • पाकिस्तान ने भारत के दावों को "झूठा" और हमले को "फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन" करार दिया, और विश्व बैंक व अन्य मंचों पर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी।


शिमला समझौता

शिमला समझौता (Shimla Agreement), जिसे शिमला संधि भी कहा जाता है, 2 जुलाई 1972 को भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित एक महत्वपूर्ण शांति समझौता था। यह समझौता 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध ( बांग्लादेश की स्वतंत्रता का कारण ) के बाद दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने और संबंधों को सामान्य करने के लिए किया गया था। इसे भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने शिमला, हिमाचल प्रदेश में हस्ताक्षर किया।

शिमला समझौते का इतिहास

  • पृष्ठभूमि:
    • 1971 का युद्ध पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना के दमन और शरणार्थी संकट के कारण शुरू हुआ।
    • युद्ध में भारत की जीत हुई, पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में स्वतंत्र हो गया, और लगभग 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत के सामने आत्मसमर्पण किया।
    • युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने और युद्धबंदियों, क्षेत्रीय नियंत्रण, और भविष्य के संबंधों पर चर्चा की आवश्यकता थी।
  • वार्ता:
    • शिमला में 28 जून से 2 जुलाई 1972 तक चली गहन वार्ताओं के बाद समझौता हुआ।
    • समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्थायी शांति, सहयोग और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान सुनिश्चित करना था।

शिमला समझौते के प्रमुख प्रावधान

  1. द्विपक्षीय समाधान:
    • दोनों देश अपने विवादों, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर से संबंधित मुद्दों, को द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से हल करेंगे, बिना किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के।
    • यह प्रावधान भारत के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों (जैसे संयुक्त राष्ट्र) से दूर रखता था।
  2. नियंत्रण रेखा (Line of Control - LoC):
    • 1971 युद्ध के बाद जम्मू-कश्मीर में स्थापित युद्धविराम रेखा को "नियंत्रण रेखा" के रूप में मान्यता दी गई।
    • दोनों देश इस रेखा का सम्मान करने और इसे एकतरफा बदलने से बचने के लिए सहमत हुए।
  3. शांति और सहयोग:
    • दोनों देश शांति, मैत्री और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाएंगे।
    • एक-दूसरे के खिलाफ बल प्रयोग या युद्ध की धमकी से बचने का वचन दिया गया।
  4. युद्धबंदियों और क्षेत्र की वापसी:
    • भारत ने 93,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा करने और युद्ध के दौरान कब्जाए गए अधिकांश क्षेत्रों को वापस करने पर सहमति दी।
    • पाकिस्तान ने बांग्लादेश के साथ संबंध सामान्य करने और उसे मान्यता देने का वादा किया।
  5. सहयोग के क्षेत्र:
    • व्यापार, संचार, विज्ञान, संस्कृति और अन्य क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।

शिमला समझौते का महत्व

  • क्षेत्रीय शांति: समझौते ने 1971 युद्ध के बाद तनाव को कम किया और दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने का आधार प्रदान किया।
  • कश्मीर मुद्दे का द्विपक्षीयकरण: कश्मीर को द्विपक्षीय मसला घोषित करके भारत ने इसे अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप से बचाया।
  • बांग्लादेश की मान्यता: समझौते ने पाकिस्तान को बांग्लादेश को मान्यता देने के लिए प्रेरित किया, जिससे दक्षिण एशिया में एक नए राष्ट्र की स्थापना को वैधता मिली।
  • नियंत्रण रेखा की स्थापना: LoC ने जम्मू-कश्मीर में एक स्पष्ट सीमा रेखा प्रदान की, जो बाद के वर्षों में दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव को प्रबंधित करने का आधार बनी।
  • नैतिक जीत: भारत ने युद्धबंदियों को रिहा करके और क्षेत्र वापस करके अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपनी उदारता और शांति की प्रतिबद्धता दिखाई।
शिमला समझौता (Shimla Agreement), 2 जुलाई 1972 को भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित एक महत्वपूर्ण शांति समझौता, दोनों देशों के बीच जम्मू-कश्मीर सहित विवादों को द्विपक्षीय रूप से हल करने और नियंत्रण रेखा (LoC) का सम्मान करने का आधार रहा है। पहलगाम आतंकी हमले (22 अप्रैल 2025) के बाद पाकिस्तान द्वारा शिमला समझौते सहित सभी द्विपक्षीय समझौतों को निलंबित करने की घोषणा ने भारत-पाकिस्तान संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर प्रभाव डाले हैं। नीचे इस निलंबन के प्रभावों को विस्तार से समझाया गया है।

शिमला समझौते के निलंबन का प्रभाव

1. भारत-पाकिस्तान संबंधों पर प्रभाव

  • कूटनीतिक संबंधों का और पतन:
    • शिमला समझौता दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता और शांति की आधारशिला था। इसका निलंबन औपचारिक संवाद के शेष चैनलों को समाप्त करता है, जिससे कूटनीतिक संबंध न्यूनतम स्तर पर पहुँच गए हैं।
    • दोनों देशों के उच्चायोगों की कर्मचारी संख्या पहले ही 55 से घटाकर 30 कर दी गई है (1 मई 2025 तक प्रभावी), और पाकिस्तान द्वारा भारतीय नागरिकों के लिए वीजा निलंबन और भारत द्वारा SAARC वीजा छूट रद्द करने से लोगों का संपर्क लगभग खत्म हो गया है।
  • विश्वास का अभाव:
    • निलंबन से दोनों देशों के बीच पहले से ही कमजोर विश्वास और टूट गया है। भारत इसे पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद समर्थन का परिणाम मानता है, जबकि पाकिस्तान भारत के सिंधु जल संधि निलंबन को "युद्ध का कार्य" मानता है।
    • यह परस्पर विरोधी कदमों का चक्र (tit-for-tat) दोनों पक्षों को सुलह की ओर बढ़ने से रोकता है।

2. जम्मू-कश्मीर और नियंत्रण रेखा (LoC) पर प्रभाव

  • नियंत्रण रेखा पर तनाव में वृद्धि:
    • शिमला समझौते ने LoC को जम्मू-कश्मीर में एक स्थिर सीमा के रूप में मान्यता दी थी, जिसे दोनों पक्ष एकतरफा बदलने से बचने के लिए सहमत थे। निलंबन के बाद, LoC पर युद्धविराम उल्लंघन, घुसपैठ और सैन्य झड़पों का जोखिम बढ़ गया है।
    • 2025 में पहले से ही LoC पर तनाव बढ़ा है, और निलंबन इसे और भड़का सकता है, जैसा कि 1999 के कारगिल युद्ध में देखा गया था, जब पाकिस्तानी घुसपैठ ने समझौते की भावना का उल्लंघन किया था।
  • कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण:
    • शिमला समझौता कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा बनाए रखता था, जिससे भारत इसे संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों से दूर रखने में सफल रहा। निलंबन के बाद, पाकिस्तान कश्मीर को फिर से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा सकता है, जिससे भारत की कूटनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है।
    • पाकिस्तान ने पहले ही संयुक्त राष्ट्र और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) जैसे मंचों पर भारत के खिलाफ अभियान चलाने की कोशिश की है, और निलंबन इसे और प्रोत्साहन दे सकता है।

3. क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रभाव

  • संघर्ष का बढ़ता जोखिम:
    • भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं, और शिमला समझौते जैसे ढांचों का निलंबन पूर्ण-स्तरीय सैन्य संघर्ष का खतरा बढ़ाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि LoC पर छोटी झड़पें भी बड़े संघर्ष में बदल सकती हैं।
    • भारत द्वारा सिंधु जल संधि का निलंबन और पाकिस्तान द्वारा शिमला समझौते का निलंबन एक-दूसरे को भड़काने वाले कदम हैं, जो क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाते हैं।
  • दक्षिण एशिया में सहयोग पर प्रभाव:
    • दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) पहले से ही भारत-पाकिस्तान तनाव के कारण निष्क्रिय है। निलंबन से क्षेत्रीय सहयोग के लिए कोई भी शेष संभावना समाप्त हो जाती है।
    • अफगानिस्तान, बांग्लादेश और अन्य पड़ोसी देश इस तनाव से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं, खासकर व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्र में।

4. सिंधु जल संधि के संदर्भ में प्रभाव

  • द्विपक्षीय सहयोग का अंत:
    • शिमला समझौता और सिंधु जल संधि दोनों ही भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय सहयोग के प्रतीक थे। दोनों के निलंबन से जल प्रबंधन, डेटा साझा करना, और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों में सहयोग समाप्त हो गया है।
    • पाकिस्तान ने विश्व बैंक से हस्तक्षेप की मांग की है, लेकिन शिमला समझौते का निलंबन दोनों देशों के बीच किसी भी संयुक्त तंत्र को पुनर्जनन करने की संभावना को कम करता है।
  • पानी को हथियार बनाने का जोखिम:
    • भारत का सिंधु जल संधि निलंबन और पाकिस्तान का जवाबी शिमला समझौता निलंबन पानी और सीमा जैसे संवेदनशील मुद्दों को हथियार बनाने की ओर इशारा करते हैं। यह "पानी नहीं बहेगा तो खून बहेगा" जैसे परिदृश्य को जन्म दे सकता है, जैसा कि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है।
    • पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और कृषि पर जल संकट का दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे वह और आक्रामक रुख अपना सकता है।

5. कूटनीतिक और कानूनी प्रभाव

  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया:
    • शिमला समझौते का निलंबन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक और शांति ढांचे का पतन दर्शाता है। फ्रांस, यूके, और अन्य देशों ने पहलगाम हमले की निंदा की, लेकिन दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है।
    • विश्व बैंक, जो सिंधु जल संधि का गारंटर है, शिमला समझौते के निलंबन पर सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता, लेकिन दोनों निलंबनों के परस्पर संबंध के कारण मध्यस्थता की कोशिश कर सकता है।
  • कानूनी चुनौतियाँ:
    • शिमला समझौते में स्पष्ट निकास खंड (exit clause Audiences:exit clause) की कमी है, और इसका निलंबन अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत चुनौतीपूर्ण हो सकता है। पाकिस्तान इसे संयुक्त राष्ट्र या अन्य मंचों पर उठा सकता है, लेकिन भारत यह तर्क दे सकता है कि आतंकवाद के कारण "परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन" (Vienna Convention on the Law of Treaties, Article 62) निलंबन को उचित ठहराता है।
    • हालांकि, बिना औपचारिक निरसन के निलंबन की कानूनी स्थिति अस्पष्ट है, जिससे दोनों पक्षों के बीच भ्रम और तनाव बढ़ सकता है।

6. भारत के लिए आंतरिक प्रभाव

  • राष्ट्रीय एकता:
    • पहलगाम हमले और उसके बाद की कार्रवाइयों ने भारत में राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया है। 24 अप्रैल 2025 को सर्वदलीय बैठक में सभी दलों ने हमले की निंदा की और सरकार की कार्रवाइयों का समर्थन किया।
    • हालांकि, LoC पर बढ़ते तनाव और संभावित संघर्ष का डर जनता में चिंता का कारण बन सकता है।
  • सुरक्षा और अर्थव्यवस्था:
    • भारत को LoC पर सैन्य तैनाती बढ़ानी पड़ सकती है, जिससे रक्षा बजट पर दबाव बढ़ेगा।
    • पर्यटन, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में, पहलगाम जैसे हमलों और बढ़ते तनाव से प्रभावित हो सकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।

7. पाकिस्तान के लिए आंतरिक प्रभाव

  • आर्थिक और सामाजिक दबाव:
    • शिमला समझौते और सिंधु जल संधि का निलंबन पाकिस्तान की पहले से ही कमजोर अर्थव्यवस्था पर दबाव डालता है। जल संकट से कृषि और जलविद्युत प्रभावित हो सकते हैं, जिससे खाद्य असुरक्षा और ऊर्जा संकट बढ़ेगा।
    • आंतरिक अस्थिरता का जोखिम बढ़ सकता है, क्योंकि जनता सरकार पर भारत के खिलाफ कठोर कार्रवाई का दबाव डालेगी।
  • सैन्य और राजनीतिक गतिशीलता:
    • पाकिस्तान की सेना, जो पहले से ही शक्तिशाली है, भारत के खिलाफ रुख को और सख्त कर सकती है, जिससे सैन्यीकरण बढ़ेगा।
    • सरकार पर भारत के साथ युद्ध की स्थिति में जाने का दबाव बढ़ सकता है, जो दोनों देशों के लिए विनाशकारी होगा।

समाधान के सुझाव

शिमला समझौते के निलंबन के प्रभावों को कम करने और क्षेत्रीय शांति को पुनर्जनन करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

  1. कूटनीतिक मध्यस्थता:
    • विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र, या तटस्थ देश (जैसे सऊदी अरब या तुर्की) दोनों पक्षों को वार्ता की मेज पर लाने के लिए मध्यस्थता करें।
    • आतंकवाद और जल संधि जैसे मुद्दों पर अलग-अलग ट्रैक पर बातचीत शुरू की जाए।
  2. आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई:
    • पाकिस्तान को लश्कर-ए-ताइबा जैसे समूहों के खिलाफ विश्वसनीय कार्रवाई करनी चाहिए, और भारत को सबूत साझा करके पारदर्शिता दिखानी चाहिए।
    • संयुक्त खुफिया साझा करने का तंत्र बनाया जाए।
  3. LoC पर तनाव कम करना:
    • दोनों पक्ष युद्धविराम को मजबूत करने और घुसपैठ रोकने के लिए संयुक्त गश्त या निगरानी तंत्र स्थापित करें।
    • LoC पर विश्वास-निर्माण उपाय (जैसे स्थानीय व्यापार या पारिवारिक मुलाकातें) फिर से शुरू किए जाएँ।
  4. शिमला समझौते की बहाली:
    • दोनों देश समझौते की मूल भावना (द्विपक्षीय समाधान, शांति, सहयोग) को पुनर्जनन करने के लिए प्रतिबद्धता जताएँ।
    • निलंबन को सशर्त वापस लिया जाए, जैसे आतंकवाद पर कार्रवाई या जल संधि पर सहयोग।
  5. अंतरराष्ट्रीय दबाव और समर्थन:
    • वैश्विक शक्तियाँ (अमेरिका, चीन, रूस) दोनों पक्षों को संयम बरतने और बातचीत शुरू करने के लिए दबाव डालें।
    • भारत को कश्मीर में मानवाधिकारों पर और पाकिस्तान को आतंकवाद पर अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही का सामना करना चाहिए।
  6. क्षेत्रीय सहयोग:
    • SAARC जैसे मंचों को पुनर्जनन करके व्यापार, पर्यावरण, और जल प्रबंधन पर सहयोग बढ़ाया जाए।
    • बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों को मध्यस्थता या समर्थन के लिए शामिल किया जाए।

निष्कर्ष

पाकिस्तान द्वारा शिमला समझौते का निलंबन, भारत के सिंधु जल संधि निलंबन के जवाब में, भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक खतरनाक मोड़ है। यह निलंबन नियंत्रण रेखा पर तनाव, क्षेत्रीय अस्थिरता, और कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण का जोखिम बढ़ाता है। दोनों देशों के बीच विश्वास का पतन और परमाणु शक्ति की उपस्थिति स्थिति को और जटिल बनाती है। दीर्घकालिक शांति के लिए, कूटनीतिक वार्ता, आतंकवाद पर सहयोग, और समझौते की भावना की बहाली आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका दोनों पक्षों को संयम और सहयोग की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण होगी

UWAA TEAM @ JPSC /UPSC/BPSC

Whatsapp/Call +919608166520

----------------------------------------------------------------

14TH JPSC ONLINE CLASS
FEES : 2000 RS /MONTH
Only 100 Students Batch -7PM-9M
NCERT CLASS – JPSC/BPSC/BSSC/JSSC - 7AM-8AM
https://www.youtube.com/@uwaajpscdhumkudiya
JOIN US - +919608166520

JPSC EXAM 2023 PT रिजल्ट - 38 में 34 अभ्यर्थी उत्तीर्ण
सीमित अभ्यर्थी उच्च सफलता दर

Comments

Popular posts from this blog

ONLY 100 STUDENTS - 14TH JPSC CLASS/ MAINS ANSWER WRITING/ FRO/ACF/PROJECT MANGER

THE Uवा  DHUMKUDIYA +919608166520,+917717789294 UWAA TEAM @ JPSC /UPSC/BPSC Whatsapp/Call +919608166520 RANEE RAJ ( बिहार सरकार में अधिकारी )  लेखिका एवं समाजसेविका   MITHILA GLOBAL AWARD, HINDUTAN YOUTH ICON AWARD आदि से सम्मानित  RAJESH KUMAR साक्षात्कार (UPSC, JPSC and BPSC )  सरकारी एवं गैर सरकारी पदों में कार्य करने का अनुभव  पीएचडी शोधार्थियों के सहायक, 21वी सदी में हिंदी उपन्यास  में आदिवासी विमर्श शोध पूरा करने में विशेष योगदान , धुमकुड़िया ( झारखंड - इतिहास एवं संस्कृति ) और To The Point Magazine , झारखंड पत्रिका का संपादन एवं लेखन एवं मिथिला ग्लोबल अवार्ड सम्मानित  UPSC/JPSC/BPSC Join Us  - Admission Fees- 500 RS फॉर्म को फील करे  Online Class - Google Meet  रिकॉर्डेड क्लास उपलब्ध रहेंगे  हर क्लास के साथ पीडीएफ नोट्स दिए जाएंगे ( हिंदी   / अंग्रेजी ) दोनों भाषाओ में  https://forms.gle/4DwMfSZN5PTBivBe6 Limited Students High Success Rate JPSC EXAM 2023  (11TH - 13TH  JPSC EXAM ) PRELIM...

JPSC ACF/ FRO NOTES झारखंड में पेसा कानून क्यों आवश्यक है ? इसको लागु करने में झारखंड में क्या चुनौतियां आ रही है , समीक्षा कीजिये।

  FRO/ACF EXAM 2025 The U वा Dhumkudiya (UPSC/JPSC/BPSC) Whatsapp /Call- +919608166520                         JPSC FRO EXAM 2025 पेपर- II: सामान्य ज्ञान कुल अंक : 100: समसामयिक घटनाएँ : राज्य (झारखंड) , राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण घटनाएँ और व्यक्तित्व , जिनमें खेल आयोजन और व्यक्तित्व शामिल हैं। भारत का इतिहास : प्राचीन , मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास , जिसमें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन , इसके सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक पहलू , 19 वीं शताब्दी का पुनरुत्थान , राष्ट्रवाद का विकास और स्वतंत्रता की प्राप्ति शामिल है। भूगोल : पृथ्वी का आकार , माप , अक्षांश , देशांतर , महासागरीय धाराएं , ज्वार-भाटा , वायुमंडल और इसकी संरचना ; भारत का भौतिक , सामाजिक और आर्थिक भूगोल ; जलवायु , वनस्पति , प्राकृतिक संसाधन ; तथा झारखंड के विशेष संदर्भ में कृषि और औद्योगिक गतिविधियां। भारतीय राजव्यवस्था : भारत की राजनीतिक प्रणाली और संविधान , जि...

क्या भारत में कमजोर विपक्ष और गठबंधन की द्वी दलीय नेतृत्व प्रणाली की राजनीति ने भारत में अध्यक्षात्मक सरकार के लिए आधार तैयार कर रही है ? विश्लेषण करे।

 भारत के राजनीतिक परिदृश्य में बहुदलीय प्रणाली, गठबंधन सरकारें और कमज़ोर विपक्ष के दौर की विशेषता है, जिसने इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या यह राष्ट्रपति प्रणाली की ओर विकसित हो सकता है। JPSC 2021 MAINS QUESTION PAPER 4 14TH JPSC Mains Answer Writing Practice  8PM  ANSWER WRITING PRACTICE https://uwaaupsc.blogspot.com/2025/04/8pm-14th-jpsc-mains-answer-writing.html अपने उत्तर लेखन क्षमता को मजबूत कीजिये Uवा UPSC के साथ  JOI N US : +919608166520  भारत में द्विदलीय गठबंधन प्रणाली का उस राजनीतिक गठबंधन से है जिसमें दो प्रमुख राष्ट्रीय दल- भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) -अपने-अपने ( राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और भारतीय गठबंधन (पूर्व में पार्टी) ) का नेतृत्व केंद्र और राज्यों में सत्ता के लिए होता है। हालाँकि भारत में बहुदलीय प्रणाली मौजूद है, जिसमें क्षेत्रीय दल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, फिर भी गठबंधन आधारित राजनीति में ये दोनों दल लगातार शामिल हैं। यह विश्लेषण भारत में द्विदलीय गठबंधन प्रणाली की प्रकृति, संरचना, वर्...